पीलिया

 पीलिया पाण्डु रोग (JAUNDICE)

रोग परिचय, लक्षण एवं कारण :- इस रोग में शरीर की चमड़ी का रंग

पीला पड़ जाता है। रोगी की आँखें तथा हाथ के नाखून आदि तक पीले पड़ जातेहैं।

 यह रोग यकृत (जिगर) की खराबी से होता है। जिगर की नली में जब पथरीअटक

 जाती है या किसी बीमारी के कारण पित्त की नली का रास्ता छोटा हो जाता है

तो पित्त आँतों में नहीं सीधा खून में मिलने लगता है। खून में इसके मिलने से ही शरीर

 में पीलापन छा जाया करता है। वैसे आमतौर पर पौष्टिक भोजन न मिलना, पाचन

 क्रिया की गड़बड़ी, बहुत ज्यादा रजः स्राव या वीर्य नाश करना,बहुत दिनों तक खून

 जाने (गिरने वाला रोग, बहुत दिनों तक मलेरिया ज्वर रहना,खुली हवा तथा सूर्य के

 प्रकाश की कमी आदि भी इस रोग की उत्त्पत्ति में मुख्य भूमिका निभाते हैं।

इस रोग में रोगी की आँखें, सारा शरीर नाखून और मूत्र पीला हो जाता है।

रोगी के मुँह का स्वाद कड़वा, जीभ पर मैल का लेप चढ़ जाना, भूख कम

 लगना आदि प्रधान लक्षण हो जाते हैं। इस कारण से नाड़ी क्षीण, शरीर में

 खुजली,आलस्य, अनिद्रा, तथा दुर्बलता हो जाती है। नाड़ी की गति कभी-कभी

 40-50 तक प्रति मिनट हो जाती है। इस रोग का यदि समय पर इलाज न किया

 गया तो शोथ होकर त्वचा तथा श्लैष्मिक झिल्ली से रक्तस्राव होने लगता है।

उपचार- कारण के अनुसार चिकित्सा करें। 

कब्ज न रहने दें। आमाशय प्रक्षालन और बस्ति कर्म (एनीमा) उपयोगी है। खाने में

 कच्चे गूलर का रस दार शाक, गरम दूध, साबू-दाना, अनार, अरारोट, मौसम्मी,

 सन्तरा का रस दें। छेने का जल दें। सुपाच्य और लघु भोजन दें। यदि ज्वर हो तो

 साबूदाना, बार्ली तथा अरारोट दें, बुखार न हो तो पुराने चावल का भात दें। मछली,

 खटाई, मिठाई, दूधघी, तेल,उड़द की दाल, बेसन की चीजें एवं मैदा की वस्तुएं न दें ।

कामला नाशक प्रमुख शास्त्रीय योग

रस :- 

चूड़ामणि रस 125 मि.ग्रा. 2-3 बार पिप्पली+मधु से।  

योगराज रस, चन्द्रसूर्यात्मक रस 120मि.ग्रा. मात्रा में त्रिफला क्वाथ से।

 स्वर्ण भूपति रस 125 मि.ग्रा. दिन में 2-3 बार पिप्पली+मधु से। 

बृ. स्वर्ण मालिनी बसन्त महामृगांक रस (मात्रा एवं अनुपान)

ये सभी रस सर्वविधि कामला नाशक हैं।

लौह एवं माण्डूर-धात्री लौह 500 मि.ग्रा. दिन में 2-3 बार मधु+धृत

शर्करा से। ताप्यादि लौह 250 मि.ग्रा. दिन में 2-3 बार मूली स्वरस से ।

कमलान्तक लौह उपर्युक्त मात्रा में धृत+मधु से, नवायस लौह, रोहितक लौह,

चतुःसम लौह उपयुक्र्त मात्रा एवं अनुपान । मन्दूरवटक उपयुक्त मात्रा में गौ

मूत्र से । सर्वविधि कामला नाशक है। चतुःसम मन्दूर कुम्भ कामला में विशेष

उपयोगी है।

भस्म - 

मन्डूर भस्म 125 से 500 मि.ग्रा. दिन में 2-3 बार पिप्पली+ मधु से दें। यह

 रक्त कण को बढाता है। लौह भस्म 250 मि.ग्रा. दिन में 2 बार पुनर्नवा स्वरस से दें,

 पित्ताशय को सबल बनाती है। ताम्र भस्म 60 मि.ग्रा. दिन में2 बार मधु से

 कुम्भकामला में दें। विमल भस्म 250 मि.ग्रा. दिन में 2 बार मधु से

दें, यह भी कुम्भ कामला में उपयोगी है। स्वर्णमाक्षिक भस्म 125 से 375 मि.ग्रा.

पिप्पली+मधु से दें। रक्त कण सुदृढ़ होते है। कासीस भस्म उपर्युक्त मात्रा एवं

अनुपान से दें। यह भी रक्त कणों को बढ़ाती है।

आसव एवं अरिष्ट-पर्पटा अरिष्ट, लोध्रासव, कुमार्यासव, लोहासव,

रोहिताकारिष्ट 15 से 25 मि.ली. समान मात्रा में जल मिलाकर भोजनोपरान्त दें।

सर्व विधि कामला में उपयोगी है।

घृत-हरिद्रादि घृत 5 ग्राम दिन में 1-2 बार दुग्ध से दें। सर्वविधि कामला

में परम उपयोगी है।

चूर्ण- 

चन्दनादि चूर्ण 3 ग्राम दिन में 1-2 बार दुग्ध से दें। यह भी

सर्वविधि पीलिए में उपयोगी है।

अवलेह - धात्र्यवलेह 5 10 ग्राम दिन 1-2 बार दुग्ध से दें।

अर्क -रक्तमित्रार्क 25 ग्राम दिन में 1-2 बार दो गुना जल मिलाकर दें।

वटी - आरोग्य वर्द्धिनी वटी 2 गोली दिन में 1-2 बार त्रिफला क्वाथ से।

चन्द्रप्रभावटी उपर्युक्त मात्रा एवं अनुपान से दें। दुग्ध वटी उपर्युक्त मात्रा में

पुनर्नवा क्वाथ से दें।

क्वाथ-

पटोलादिगण क्वाथ 10-20 का क्वाथ कर दिन में 1-2 वार,

फलात्रिकादि क्वाथ उपयुक्त मात्रा में दें। सभी सर्वाविधि कामला में उपयोगी है।

कामला चिकित्सा सूत्र - रोगी को तिक्त रस वाले पदार्थ खिलायें। मृदु

विरेचन करवा कर पित्त शामक चिकित्सा करें।


कामला नाशक प्रमुख आयुर्वेदीय योग

लिवोमिन टेबलेट (चरक) - वयस्कों को 2-2 गोली दिन में 2-3 बार

तथा बच्चों को 1-1 गोली 2-3 बार ताजे जल से दें। यकृत-जन्य विकारों यथा-

कामला, पान्डु में विशेष उपयोगी है।

लिवशा सिरप 2–2 चमच दिन में 2 बार 

लिव 52 टेबलेट एवं (Liv. 52) सीरप (हिमालय ड्रग) - वयस्कों को

2 गोली दिन में 3 बार जल से दें तथा सीरप 1-2 चम्मच दिन में 3 बार। 

अभी आगे भी है॥

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